"धर्म नहीं, दिल जोड़ो")

 "26 मासूम ज़िंदगियाँ चली गईं…

कोई हिंदू था, कोई मुसलमान… मगर मौत ने किसी का मजहब नहीं पूछा।

आज भी हम आपस में लड़ते हैं, एक-दूसरे को दोष देते हैं, मगर सवाल ये है — क्या इंसान होना काफी नहीं?

क्या अब भी हम नहीं समझेंगे कि अगर हम साथ नहीं आए, तो नफरत हम सबको मिटा देगी?

अब समय आ गया है कि हम मिलकर सिर्फ एक ही धर्म को माने — इंसानियत का।"



-(मूल बातें):


1. मौत मजहब नहीं देखती:

जब किसी का अपना चला जाता है, तो वो ये नहीं पूछता कि सामने वाला कौन से धर्म का है। दर्द सबका एक-सा होता है।



2. हिंदू-मुस्लिम साथ आएं:

अब वक्त है कि हम दीवारें गिराएं, दिल मिलाएं। नफरत फैलाने वालों को जवाब दें अपने प्यार से। एक-दूसरे के त्योहार मनाएं, एक-दूसरे का दर्द समझें।



3. इंसान पहले, बाकी बाद में:

पहले हम इंसान हैं, फिर हिंदू या मुसलमान।

मोहब्बत का हाथ बढ़ाओ, नफरत की दीवारें खुद-ब-खुद गिर जाएंगी।



4. यही है असली देशभक्ति:

देश तभी मजबूत होगा जब इसके लोग आपस में जुड़े रहेंगे।

अगर हम एक-दूसरे से लड़ते रहेंगे, तो दुश्मन को हमें तोड़ने में वक्त नहीं लगेगा।



5. आओ एक वादा करें:

आज से हर इंसान को इंसान समझेंगे।

किसी का नाम, धर्म, जाति नहीं पूछेंगे — बस उसका दिल देखेंगे।





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अंत (Conclusion):


"ये आग, ये नफरत, ये जहर फैलाने वाले जीत न पाएं —

आओ हम हाथ बढ़ाएं, एक-दूसरे का दर्द बाँटें,

और कहें — अब बस इंसानियत ही हमारा धर्म है।

क्योंकि अं

त में इंसान ही इंसान के काम आता है।"

अब तो उठ जाओ और कितना सोना है धर्म धर्म करते इंसानियत खो दी अब तो उठ जाओ ......


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